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तो क्या मालिकान ही केसर मिल को बचाना नहीं चाहते?

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तो क्या मालिकान ही केसर मिल को बचाना नहीं चाहते?

जागरण मोर्चा कार्यालय
आर . के. पांडेय
बहेड़ी। कभी करीब 300 करोड़ सालाना तक की कमाई कर एशिया भर में नाम कमा चुकी केसर चीनी मिल आज जिस दौर से गुजर रही है, वह किसी से भी छिपा नहीं रह गया है। जिला प्रशासन से लेकर, समाधान दिवस तथा थाना दिवसों में विभिन्न किसान संगठनों की ओर से लगातार बकाया मूल्य भुगतान को लेकर आवाज बुलंद की जा रही है। किसान गन्ना मूल्य न मिल पाने से आर्थिक संकट से जूझ रहा है इसमें कोई संशय नहीं है। बावजूद इसके किसानों का एक बड़ा वर्ग नहीं चाहता कि केसर मिल बंद हो जाए पर आजकल जो हालात बने हुए हैं उनके चलते मिल बिकने के अलावा कोई विकल्प भी नजर नहीं आता। विचारणीय है कि, विषम से विषम परिस्थितियों में भी हर कारोबारी यह चाहता है कि किसी तरह वह अपनी संपत्ति को बचा सके पर हैरत अंगेज यह है कि केसर मिल मालिकान की ओर से ऐसा कोई प्रयास सरकार से मदद या फिर कुछ और मोहलत पाने के लिए नहीं किया गया । तो, ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मिल मालिकान ही मिल को अब चलाना नहीं चाहते?
गन्ना विभाग से जुड़े एक अधिकारी से इस संबंध में जानकारी करने के दौरान उन्होंने बताया कि पिछले दिनों जिलाधिकारी अविनाश सिंह ने किसानों के गन्ना मूल्य भुगतान को लेकर मिल प्रबंधन तथा गन्ना विभाग के अधिकारियों की बैठक बुलाई थी जिसमें मिल को बचाने को लेकर छिड़े किसी प्रसंग पर डी एम ने कहा कि “प्यासा कुएं के पास जाता है, कुआं खुद चलकर नहीं आता”। वक्तव्य से साफ़ था कि अगर मिल मालिकान की सरकार से कुछ मदद पाने की चाहत रही होती तो उचित पटल पर पैरवी की गई होती।
जानकारों की मानें तो, केसर मिल पर गन्ना किसानों के 160 करोड़ भुगतान को मिलाकर कुल 334 करोड़ की देनदारी है जिसमें ब्याज लगाकर कुछ बैंकों की भी रकम फंसी हुई है। मुंडिया मुकर्रमपुर तथा जाजूनागर की आराजी से मिल पाने वाली रकम ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर होगी। ऐसे में फिलहाल मिल की बिक्री के सिवाय दूसरा कोई उपाय नजर नहीं आता।
संकट किसानों के समक्ष भी मुंह बांयें खड़ा है। बकाया भुगतान तो देर सवेर हो जाएगा पर अगर मिल बंद हो गयी तो आगामी वर्षों में गन्ना ठिकाने लगाने में बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ेगा। स्थानीय गन्ना समिति क्षेत्र का करीब 1.5 करोड़ कुंतल गन्ना, जिसका 80 फीसदी हिस्सा अकेले केसर मिल पेरती थी, उसे गन्ना विभाग को आसपड़ोस की चीनी मिलों को आबंटित करना पड़ जाएगा और जबरन थोपे जाने पर चीनी मिल मिलें अपनी शर्तों या मनमानी पर उतर सकती हैं।
मिल मालिकान की ओर से मिल का बिक्री मूल्य 455 करोड़ आंककर डिमांड की बात कही जा रही है। मिल 50 हैक्टेयर निजी तथा 17 हैक्टेयर लीज की भूमि पर स्थापित है। यहाँ गौरतलब है कि, स्थानीय गन्ना समिति क्षेत्र के बहादुर गंज में त्रिवटीनाथ शुगर एंड केमिकल्स लिमिटेड नाम से एक और यूनिट पर तेजी से काम चल रहा है पर उस यूनिट की क्षमता इतनी नहीं है कि वह केसर मिल का विकल्प बन सके। यूनिट की क्रशिंग क्षमता 25 हजार कुंतल की बताई जा रही है। ऐसे में अगर केसर मिल के बंद होने की नौबत आई, जिसके आसार नजर आ रहे हैं तो क्षेत्र के गन्ना बितरण की व्यवस्था मीरगंज, नबाबगंज तथा पीलीभीत चीनी मिल आदि में करने के लिए गन्ना विभाग को जूझना ही पड़ सकता है।

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