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करोड़ों के घोटाले के आरोपों पर पर्दा, जांच में शामिल बाबू पर कार्रवाई कब? शत्रु संपत्ति से सटी जमीनों की खरीद-फरोख्त और फर्जी वारिस बनाने के आरोपों की जांच का मामला फिर चर्चा में

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करोड़ों के घोटाले के आरोपों पर पर्दा, जांच में शामिल बाबू पर कार्रवाई कब?

 

 

शत्रु संपत्ति से सटी जमीनों की खरीद-फरोख्त और फर्जी वारिस बनाने के आरोपों की जांच का मामला फिर चर्चा में

 

जागरण मोर्चा कार्यालय

 

बदायूं। रामलीला की अनुमति के नाम पर 50 हजार रुपये मांगने के आरोपों से घिरे बाबू आशीष सक्सेना का पुराना जमीनों से जुड़ा मामला एक बार फिर चर्चा में है। सहसवान में शहवाजपुर की जमीनों को फर्जी दस्तावेजों और कथित तौर पर फर्जी वारिसों के जरिए खुर्द-बुर्द कर करोड़ों रुपये के वारे-न्यारे किए जाने के आरोपों की पहले भी जांच हो चुकी है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि तत्कालीन अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका भी जांच में सामने आई थी, लेकिन समय बीतने के साथ मामला ठंडे बस्ते में चला गया।

 

मामले को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जिस बाबू पर पहले से गंभीर आरोपों की जांच हो चुकी है, वह अब भी महत्वपूर्ण कार्यालय से संबद्ध कैसे है। खास बात यह है कि आशीष सक्सेना वर्तमान में सिटी मजिस्ट्रेट कार्यालय से संबद्ध बताए जाते हैं और इसी कार्यालय के अधिकारी को जांच टीम में शामिल किए जाने पर भी सवाल उठ रहे हैं। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इससे जांच की निष्पक्षता को लेकर संदेह पैदा होता है।

 

सहसवान के शहवाजपुर में कुछ वर्ष पहले गाटा संख्या 118, 119, 120, 143 और 145 समेत अन्य जमीनों को कम कीमत में खरीदकर प्लाटिंग के बाद ऊंची कीमतों पर बेचने के आरोप लगे थे। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि पाकिस्तान चले गए लोगों की संपत्तियों से संबंधित अभिलेखों में हेरफेर कर फर्जी वारिस तैयार किए गए। इसी क्रम में विरासत संबंधी अभिलेखों में नवेद के पिता के स्थान पर उसके नाना हबीब बानो के पति खालिद उमर खान का नाम दर्ज किए जाने का आरोप भी लगाया गया था।

 

शिकायत में यह भी कहा गया कि नवेद की बहन इरम के नाम जारी पॉवर ऑफ अटॉर्नी में तारीख दर्ज नहीं थी। आर-6 के पृष्ठ संख्या 428 और 435 पर एक ही वाद संख्या 889 के आधार पर नाम चढ़ाए जाने पर भी सवाल उठे थे। इन कथित अनियमितताओं के सामने आने के बाद तत्कालीन डीएम मनोज कुमार ने पुरानी फाइलें निकलवाकर मामले की जांच कराई थी।

 

जांच में नाम आए, कमेटी ने भी बताई थी जिम्मेदारी

 

बदायूं। सहसवान निवासी जमशेद की शिकायत में तत्कालीन तहसीलदार धीरज कुमार, तत्कालीन एसडीएम के स्टेनो आशीष सक्सेना समेत कई कर्मचारियों के नाम सामने आए थे। तत्कालीन एडीएम रामनिवास शर्मा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय कमेटी से जांच कराई गई। शिकायत पक्ष का दावा है कि कमेटी की जांच में संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय की गई थी। हालांकि बाद में अधिकारियों के स्थानांतरण के साथ मामला आगे नहीं बढ़ सका।

 

निकाय चुनाव से पहले तत्कालीन डीएम मनोज कुमार ने पूर्व की जांच से असंतोष जताते हुए दोबारा जांच के आदेश दिए थे। इसके बाद भी उनके स्थानांतरण के बाद फाइल फिर आगे नहीं बढ़ सकी। अब रामलीला की अनुमति के नाम पर रुपये मांगने के आरोप के बाद पुराने प्रकरण की चर्चा ने प्रशासनिक कार्रवाई पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

रामलीला कमेटी के अरविंद कांत के अनुसार, अनुमति के लिए पहले भी रुपये दिए जाने की बात सामने आती रही है। उनका आरोप है कि इस बार बाबू आशीष सक्सेना ने 50 हजार रुपये की मांग की। मामला भाजपा जिलाध्यक्ष राजीव गुप्ता के संज्ञान में पहुंचा तो उन्होंने इसे नैतिक पतन बताते हुए बाबू द्वारा रकम मांगने की बात कही। साथ ही उन्होंने संकेत दिया कि इतनी हिम्मत किसी के इशारे के बिना संभव नहीं है।

 

हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। ऐसे में अब प्रशासन के सामने पुराने जमीन प्रकरण की फाइल दोबारा खोलकर पूरे रिकॉर्ड की जांच कराने और रामलीला अनुमति प्रकरण में लगाए गए आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने की चुनौती है। यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि पूर्व की जांच में जिन अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल उठे थे, उनके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई और यदि कार्रवाई नहीं हुई तो इसकी वजह क्या रही।

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