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खुसरो डिग्री कॉलेज की जमीन बिकने के बाद जागा जितेंद्र का दावा, 14 साल तक क्यों नहीं दर्ज कराया मुकदमा? जमीन की बिक्री के बाद पुराने विवाद ने पकड़ा तूल, मुकदमे की निष्पक्ष जांच और शिकायतकर्ता के दस्तावेजों की पड़ताल की उठी मांग

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खुसरो डिग्री कॉलेज की जमीन बिकने के बाद जागा जितेंद्र का दावा, 14 साल तक क्यों नहीं दर्ज कराया मुकदमा?
जमीन की बिक्री के बाद पुराने विवाद ने पकड़ा तूल, मुकदमे की निष्पक्ष जांच और शिकायतकर्ता के दस्तावेजों की पड़ताल की उठी मांग

शेर अली जाफरी,जमीन विक्रेता

 

वजीरगंज (बदायूं)। वजीरगंज थाना क्षेत्र के सरौरी गांव के पास स्थित खुसरो डिग्री कॉलेज की जमीन को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। कॉलेज की जमीन की खरीद-बिक्री के बाद जितेंद्र की ओर से जमीन पर दावा किए जाने और मुकदमा दर्ज होने के मामले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जमीन को लेकर विवाद पहले से था, तो संबंधित पक्ष ने करीब 14 साल तक मुकदमा दर्ज कराने की पहल क्यों नहीं की? जमीन की बिक्री के बाद ही मामला सामने आने से पूरे प्रकरण को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।

मामले में एक पक्ष का आरोप है कि जमीन की बिक्री के बाद पुराने विवाद को उठाकर कॉलेज के अध्यक्ष समेत छह लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया है। पीड़ित पक्ष का कहना है कि जमीन के स्वामित्व और खरीद-बिक्री से संबंधित दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच होने पर वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है। हालांकि, इन आरोपों की सत्यता पुलिस की जांच और संबंधित अभिलेखों के परीक्षण के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

2014 में खरीदी गई थी 20 बीघा जमीन

वैभव अग्रवाल

 

 

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 2014 में शेर अली जाफरी ने कुंडली देवी से करीब 20 बीघा जमीन खरीदी थी। इसके बाद इसी जमीन पर खुसरो डिग्री कॉलेज का संचालन शुरू किया गया। बताया जाता है कि कॉलेज करीब 10 साल तक संचालित होता रहा। वर्ष 2025 में कॉलेज की मान्यता समाप्त होने की जानकारी भी सामने आई है। इसके बाद जमीन की बिक्री और उससे जुड़े अधिकारों को लेकर विवाद की स्थिति बनने की बात कही जा रही है।

इस पूरे घटनाक्रम में जमीन की खरीद, कॉलेज के संचालन, मान्यता समाप्त होने और बाद में हुई बिक्री से संबंधित दस्तावेज महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि सभी पक्ष अपने-अपने दावों के समर्थन में उपलब्ध अभिलेख जांच एजेंसी के समक्ष प्रस्तुत करें, ताकि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों की पुष्टि की जा सके।

14 साल तक चुप्पी, अब मुकदमा दर्ज होने पर सवाल

इस प्रकरण में सबसे अहम सवाल कथित 14 साल की देरी को लेकर उठ रहा है। यदि शिकायतकर्ता का जमीन पर पहले से कोई अधिकार या दावा था, तो इतने लंबे समय तक कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या इस अवधि में जमीन को लेकर कोई आपत्ति दर्ज कराई गई थी? क्या संबंधित पक्षों के बीच पहले कोई विवाद या कानूनी प्रक्रिया चली थी? इन सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है।

हालांकि, केवल देरी के आधार पर किसी शिकायत को झूठा नहीं माना जा सकता। जमीन से जुड़े मामलों में पुराने दस्तावेज, स्वामित्व का इतिहास, रजिस्ट्री, कब्जे की स्थिति और शिकायत में लगाए गए आरोपों की प्रकृति महत्वपूर्ण होती है। इसलिए पूरे मामले की जांच तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर की जानी चाहिए।

पुलिस की कार्यशैली पर भी उठे सवाल

मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। पीड़ित पक्ष का कहना है कि जमीन से जुड़े दस्तावेजों और पुराने घटनाक्रम की पड़ताल किए बिना मुकदमा दर्ज किए जाने से कई संदेह पैदा हुए हैं। सवाल यह भी है कि शिकायत में लगाए गए आरोपों के समर्थन में कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए और उनकी प्रारंभिक स्तर पर क्या जांच की गई?

दूसरी ओर, किसी शिकायत पर मुकदमा दर्ज होना अपने आप में आरोपों के सही होने का प्रमाण नहीं है। पुलिस को निष्पक्ष विवेचना के दौरान शिकायतकर्ता और आरोपित पक्ष, दोनों के दस्तावेजों तथा बयानों की जांच करनी होगी। जमीन की रजिस्ट्री, संबंधित राजस्व अभिलेख, स्वामित्व की कड़ियां और अन्य उपलब्ध साक्ष्य इस मामले की दिशा तय कर सकते हैं।

मानहानि की कार्रवाई की तैयारी

पीड़ित पक्ष का कहना है कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप निराधार हैं और इससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा है। इसी आधार पर वे न्यायालय के माध्यम से मानहानि का मामला दर्ज कराने की तैयारी कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि जांच में आरोप गलत पाए जाते हैं, तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

अब सभी की निगाहें पुलिस की विवेचना पर टिकी हैं। देखना होगा कि जांच में जमीन के वास्तविक स्वामित्व, खरीद-बिक्री के दस्तावेजों और मुकदमे में लगाए गए आरोपों को लेकर क्या तथ्य सामने आते हैं। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि यदि किसी पक्ष की ओर से जानबूझकर गलत तथ्य प्रस्तुत करने की पुष्टि होती है, तो कानून के अनुसार क्या कदम उठाए जाते हैं।

फिलहाल, खुसरो डिग्री कॉलेज की जमीन का यह विवाद केवल दो पक्षों के दावों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि मुकदमा दर्ज करने की प्रक्रिया और जांच की निष्पक्षता को लेकर भी चर्चा का विषय बन गया है। मामले का अंतिम सच दस्तावेजों, साक्ष्यों और निष्पक्ष कानूनी जांच के बाद ही सामने आ सकेगा।

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