शिविर मे केवल कृत्रिम अंग बांटने का जरिया नहीं होगा, बल्कि यह सैकड़ों परिवारों के अंधेरे जीवन में उम्मीद का नया सवेरा लेकर आएगा: ज्ञानेंद्र सिंह
हरिओम बाजपेई
जागरण मोर्चा कार्यालय।
पीलीभीत।संवेदना की मिसाल जब कुर्सी छोड़कर जनता के द्वार पहुंचे जिलाधिकारी ज्ञानेंद्र सिंह
प्रशासनिक ओहदे और प्रशा सनिक फाइलों से परे जब कोई अधिकारी सेवा को अपना धर्म बना ले, तो जनता के दिलों में उसकी तस्वीर एक प्रशासक की नहीं, बल्कि एक मसीहा की बन जाती है। जिला प्रशासन की जिम्मेदारी संभाल रहे जिला धिकारी ज्ञानेंद्र सिंह आज पूरे जनपद में एक ऐसे ही मददगार के रूप में चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। उनके फैसलों में न केवल प्रशासनिक दृढ़ता दिखती है, बल्कि एक ऐसा संवेदनशील दिल भी धड़कता है जो असहायों और पीड़ितों के दर्द को गहराई से महसूस करता है। अब कोई दिव्यांगता से लाचार न रहे माह अक्टूबर में विशाल कृत्रिम अंग शिविर हाल ही में जिलाधिकारी ने समाज के उन बेबस और असहाय व्यक्तियों की पीड़ा को समझा, जो किसी दुर्घटना या बीमारी के कारण अपने अंग गंवा चुके हैं। बिना सहारे के ज़िंदगी जीने की तड़प और लाचारी को महसूस करते हुए उन्होंने माह अक्टूबर में एक अत्यंत विशाल ‘कृत्रिम अंग प्रत्यारोपण शिविर’ आयोजित करने का ऐतिहासिक फैसला लिया है। उनकी यह सोच केवल एक कार्यक्रम आयोजित करने तक सीमित नहीं है। डीएम ने बेहद भावुक अपील करते हुए कहा है कि इस बार प्रचार प्रसार इतना व्यापक होना चाहिए कि पूरे जनपद में कोई भी कटे अंग का व्यक्ति इस लाभ से वंचित न रह जाए। हर लाचार को एक नया सहारा मिले, हर कोई अपने पैरों पर खड़ा हो सके यही उनका संकल्प है। सरकारी तंत्र से आगे, अपनी व्यक्तिगत संवेदना का उदाहरण यह पहला प्रयास नहीं है। इससे पहले भी जनपद वासियों ने देखा है कि जब भी किसी गरीब, बुजुर्ग या बेबस की पुकार उन तक पहुंची, उन्होंने पद की गरिमा और दफ्तर के दरवाजों को आड़े नहीं आने दिया। वे खुद अपनी कुर्सी छोड़ कर असहायों के दरवाजों तक पहुंचे हैं, उनके आंसू पोंछे हैं और उनका हाथ थामा है।अक्सर देखा जाता है कि अधिकारी सिर्फ सरकारी योजनाओं का लाभ दिलवाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेते हैं, लेकिन ज्ञानेंद्र सिंह की दरिया दिली इससे बहुत आगे है। सरकारी मदद सुनिश्चित कराने के साथ साथ, उन्होंने कई बार अपनी व्यक्तिगत सैलरी से आगे बढ़कर जरूरत मंदों की आर्थिक मदद की है। जब एक जिलाधिकारी अपनी निजी कमाई से किसी गरीब का इलाज या मदद कराता है तो यह साबित होता है कि इंसानियत से बड़ा कोई पद नहीं होता। आज पूरा जिलाधिकारी की इस अनोखी और मानवीय पहल की सराहना कर रहा है। माह अक्टूबर में लगने वाला यह शिविर केवल कृत्रिम अंग बांटने का जरिया नहीं होगा, बल्कि यह सैकड़ों परिवारों के अंधेरे जीवन में उम्मीद का नया सवेरा लेकर आएगा। ऐसे अधिकारियों का होना यह भरोसा दिलाता है कि जब तक समाज में ऐसे हमदर्द मौजूद हैं, तब तक कोई भी बेबस इंसान अकेला नहीं है।
बाक्स मे
दो अक्टूबर से पाच अक्टूबर कोहनी या कंधे के नीचे से हाथ गंवा चुके दिव्यांग जनों को अब कृत्रिम हाथ की सुविधा मुफ्त मिलेगी। जिले में एक विशेष शिविर निशक्त जन सेवा संस्थान और इनाली फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित होगा।





