गूगल से पूछकर डॉक्टरी कर रहे है लोग,अपना स्वयं इलाज कर रहे है लोग
उल्टी सीधी दवा खाकर ठीक ना होने पर डिप्रेशन में जा रहे है लोग
ये ट्रेंड बहुत ही खतरनाक, जागरूकता की कमी
धनंजय कुमार पांडेय
बदायूं।
आजकल इंटरनेट और गूगल ने जीवन को आसान बना दिया है। जानकारी के किसी भी विषय पर एक क्लिक में जवाब मिल जाता है। लेकिन स्वास्थ्य के मामले में यह सुविधा एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। लोग गूगल पर लक्षण टाइप करके खुद को डॉक्टर बना बैठे हैं। बुखार, सिरदर्द, पेट दर्द या थकान जैसी सामान्य शिकायतों से लेकर गंभीर बीमारियों तक, लोग स्वयं निदान कर लेते हैं और उल्टी-सीधी दवाइयाँ खाकर खुद का इलाज शुरू कर देते हैं। यह ट्रेंड न केवल स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर रहा है।
गूगल सर्च पर मिलने वाली जानकारी अक्सर अधूरी, गलत या अतिरंजित होती है। एक ही लक्षण कई बीमारियों का संकेत हो सकता है। उदाहरण के लिए, सीने में दर्द हार्ट अटैक भी हो सकता है और गैस की समस्या भी। लेकिन गूगल पर पढ़कर लोग तुरंत दिल की दवाइयां या अन्य दवाएं लेना शुरू कर देते हैं। कई बार ये दवाइयां नकली, एक्सपायर्ड या गलत खुराक में होती हैं। बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक्स लेने से एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस बढ़ रहा है, जो भविष्य में आम संक्रमणों को भी जानलेवा बना सकता है। एलर्जी, साइड इफेक्ट्स और दवाओं के आपसी इंटरैक्शन से स्थिति और बिगड़ जाती है।सबसे चिंताजनक बात यह है कि जब स्वयं इलाज काम नहीं करता, तो लोग डिप्रेशन और चिंता के शिकार हो जाते हैं। वे सोचते हैं कि उनकी बीमारी बहुत गंभीर है, क्योंकि गूगल ने उन्हें कैंसर, किडनी फेलियर या अन्य भयानक रोगों की सूची दिखा दी।
“गूगलिंग” के कारण स्वास्थ्य संबंधी चिंता (हेल्थ एंग्जायटी ) बढ़ रही है। लोग बार-बार सर्च करते हैं, नए-नए लक्षण खोजते हैं और मानसिक रूप से टूट जाते हैं। कई मामलों में सही इलाज में देरी हो जाती है, जिससे बीमारी पुरानी या जानलेवा हो जाती है।यह प्रवृत्ति युवाओं और मध्यम वर्ग में ज्यादा दिख रही है। डॉक्टर के पास जाने में समय, पैसा और डर लगता है, इसलिए गूगल आसान विकल्प लगता है।
सोशल मीडिया पर भी अधूरी सलाहें और घरेलू नुस्खे फैल रहे हैं, जो स्थिति को और खराब करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और कई चिकित्सा विशेषज्ञ बार-बार चेतावनी दे चुके हैं कि स्व-चिकित्सा (self-medication) घातक हो सकती है।इस खतरनाक ट्रेंड से बचने का एकमात्र तरीका जागरूकता और जिम्मेदारी है। लक्षण दिखने पर विश्वसनीय डॉक्टर या नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र से सलाह लें। इंटरनेट का इस्तेमाल केवल सामान्य जानकारी के लिए करें, निदान या इलाज के लिए नहीं। परिवार और दोस्तों को भी समझाएं कि गलत दवाऐ लेना स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।
सरकार और स्वास्थ्य विभाग को भी डिजिटल साक्षरता अभियान चलाने चाहिए, ताकि लोग सही और गलत जानकारी में फर्क समझ सकें।निष्कर्ष रूप में, गूगल एक उपकरण है, डॉक्टर नहीं। स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील मुद्दे पर विशेषज्ञ की सलाह अपरिहार्य है। स्वयं इलाज करके न केवल शरीर को नुकसान पहुँचाया जा रहा है, बल्कि मन भी बीमार हो रहा है।
समय रहते इस ट्रेंड को रोकना जरूरी है, वरना आने वाले समय में दवाओं के दुष्प्रभाव और मानसिक स्वास्थ्य संकट और बढ़ेंगे। सही जानकारी, सही डॉक्टर और सही समय पर इलाज ही स्वस्थ जीवन की कुंजी है




