थाने से मिली कथित ‘हामी’, चौकी ने रोका तो भड़का सीकरी
पांच दिन पहले पुलिस तक पहुंच गया था प्रतिमा स्थापना का मामला, प्रधानी की सियासत ने विवाद को दी हवा
जागरण मोर्चा कार्यालय
देवेश मिश्रा
बदायूं। राजा की सीकरी में प्रतिमा स्थापना को लेकर हुआ बवाल कई दिनों से पक रहे विवाद का नतीजा बताया जा रहा है। घटनाक्रम से जुड़े सूत्रों के अनुसार, विवाद की शुरुआत बवाल से करीब पांच दिन पहले ही हो गई थी, जब प्रतिमा स्थापना से जुड़े कुछ लोग फैजगंज थाने पहुंचे थे। वहां अनुमति को लेकर हुई कथित बातचीत के बाद मामला शांत नहीं हुआ, बल्कि अलग-अलग स्तर पर हुई पुलिस कार्रवाई ने विवाद को और बढ़ा दिया।
सूत्रों के मुताबिक, एक संगठन से जुड़े युवा, सेवानिवृत्त कर्मचारी और निर्माण समिति से जुड़े व्यक्ति ने थाना प्रभारी सुभाष कुमार से मुलाकात की थी। बताया जाता है कि इन लोगों ने सरकारी भूमि पर प्रतिमा स्थापित करने की बात रखी। थाना प्रभारी ने प्रशासनिक अनुमति के बारे में जानकारी ली तो कथित तौर पर अनुमति नहीं होने की बात सामने आई।
आरोप है कि अनुमति नहीं होने की जानकारी के बावजूद थाना स्तर से तत्काल प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। सूत्रों का दावा है कि बातचीत के दौरान संबंधित लोगों को ऐसा भरोसा मिला कि प्रतिमा स्थापना में तत्काल पुलिस हस्तक्षेप नहीं होगा। हालांकि, इन दावों की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
इसके बाद मामला गांव की प्रधानी की राजनीति से जुड़ता चला गया। दूसरे पक्ष को आशंका थी कि प्रतिमा स्थापना का राजनीतिक लाभ एक गुट को मिल सकता है। इसी कारण प्रतिमा स्थापना की सूचना स्थानीय चौकी पुलिस तक पहुंचाई गई। शिकायत मिलने पर चौकी पुलिस मौके पर पहुंची और निर्माण कार्य रुकवा दिया।
दो स्तर की कार्रवाई ने बढ़ाई नाराजगी
एक ही मामले में थाने और चौकी स्तर पर सामने आई कथित अलग-अलग भूमिका ने स्थिति को पेचीदा बना दिया। प्रतिमा स्थापना कराने वाले पक्ष को जहां पहले कथित तौर पर कार्रवाई नहीं होने का भरोसा मिला था, वहीं चौकी पुलिस ने मौके पर पहुंचकर काम रोक दिया। इससे संबंधित पक्ष में पुलिस के खिलाफ नाराजगी बढ़ने लगी।
सूत्रों का कहना है कि इसके बाद चौकी पुलिस को ही विवाद का जिम्मेदार मानकर विरोध शुरू हुआ। धीरे-धीरे मामला प्रशासनिक अनुमति और प्रतिमा स्थापना से आगे बढ़कर पुलिस के साथ टकराव में बदल गया। इसी तनाव ने बाद में हिंसक रूप ले लिया और पथराव तथा बवाल की स्थिति पैदा हो गई।
समय रहते हस्तक्षेप होता तो टल सकता था बवाल?
सीकरी प्रकरण अब पुलिस और प्रशासन की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर रहा है। सवाल यह है कि जब प्रतिमा स्थापना को लेकर पांच दिन पहले ही पुलिस को जानकारी मिल गई थी और अनुमति का मामला स्पष्ट नहीं था तो उसी समय दोनों पक्षों को बुलाकर स्थिति साफ क्यों नहीं की गई।
यदि सरकारी भूमि पर बिना अनुमति निर्माण किया जा रहा था तो नियमानुसार कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि कार्रवाई जरूरी नहीं थी तो बाद में चौकी पुलिस को मौके पर भेजकर काम क्यों रुकवाया गया? इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे।
फिलहाल पूरे मामले की जांच में पांच दिन पहले हुई कथित बातचीत, थाने और चौकी स्तर पर हुई कार्रवाई तथा दोनों पक्षों के बीच बढ़े राजनीतिक तनाव की कड़ियों को जोड़कर देखा जाना महत्वपूर्ण होगा। यदि शुरुआती घटनाक्रम की पुष्टि होती है तो साफ होगा कि सीकरी में बवाल की जमीन अचानक नहीं बनी थी, बल्कि कई दिनों से तैयार हो रहे विवाद ने आखिरकार हिंसक रूप ले लिया।





